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Showing posts from 2015

मेट्रो में हिन्दी की क्लास

हिन्दी में चलो कैसे बोलेंगे वो लगातार इसकी प्रैक्टिस कर रहे थे। पहली बार में उनकी जुबान से श्लो निकला तो गाइड ने समझाया कि कैसे बोलना है। उऩ चारों फिरंगियों ने एक बार फिर कोशिश की लेकिन नाकाम रहे। दो गुटों में ये छह विदेशी अक्षरधाम स्टेशन से मेट्रो में चढ़े थे। साथ में गाइड भी था। कोच में आते ही दो महिलाएँ तो अलग अपनी बातों में मशगूल हो गई जबकि बाकी चार अपने गाइड के साथ खड़े हो गए। जो चार गाइड के साथ खड़े थे उनमें दो महिलाएं और दो पुरुष थे। पुरूषों ने हाफ पैंट पहनी थी और सिर पर टोपी कुछ इस तरह लगाई थी कि उसका अगला भाग पीछे की ओर था। उनके साथ की महिलाओं में एक करीब सवा छह फीट लंबी थी। विदेशी के साथ अपनी लंबाई के कारण उन महिलाओं पर कोच के ज्यादातर यात्रियों की निगाह थी लेकिन वो इन सबसे बेखबर हिन्दी सीखने में बिजी थी। ये विदेशी जब मेट्रो में घुसे तो कुछ यात्री गेट पर खड़े थे। उन्हें हटाने के लिए गाइड ने सबसे पहले बोला था चलो। यात्री हट गए तो सभी विदेशी एक कोने में खड़े हो चलो शब्द का मतलब पूछने लगे। गाइड ने उन्हें इंग्लिश में इसका मतलब बता दिया। अब सब की उत्सुकता थी कि चलो को बोला कैसे ...

सरकारी सिम का सितम

पांच बजे चुके थे। साथी के साथ तेजी से रोहिणी सेक्टर तीन के संचार हाट पहुंचा। डर था कहीं बाबू चले ना गए हो? और सरकारी दफ्तर की तरह वहां की टाइमिंग भी दस से छह है लेकिन क्या भरोसा कोई मिले या नहीं। आगे ब ढ़ा ही था कि गेट पर गार्ड ने रोक लिया। पूछा कहां जाना है। मैंने कहा माइक्रो सिम लेना है। कमरा नंबर दो में जाइये। उसने कहा। उनकी उम्र पचपन साल के करीब होगी होगी। वो कमरा नंबर दो में क्रीम कलर का सफारी सूट पहने टेबल पर पेन से खेल रहे थे। टेबल पर चारों तरफ बेतरतीब ढंग से फॉर्म बिखरे थे। हफ्ते भर से बढ़ी पकी दाढ़ी इशारा कर रही थी कि वो धूप में नहीं अनुभव के कारण सफेद हुई है। सामने लोहे की जुड़वा टेबल थी। वैसी जैसी सरकारी अस्पतालों में होती हैं। क्या काम है? उन्होंने चश्मे के पीछे से झांकते माथे पर सलवट लाते हुए कहा। स्मार्ट फोन में डालने के लिए माइक्रो सिम लेना है। मैंने कहा। पहचान पत्र लाए हो। उनका अगला सवाल था। मैंने कहा पहचान पत्र तो नहीं है पर ड्राइविंग लाइसेंस है। लाइसेंस पर पता वहीं है ना जो हमारे रिकॉर्ड में है। उन्होंने सवाल किया। जी हां, वही है मैंने सहमति में सिर हिलाया। फोटो कॉ...

ताशकंद की तह

वो छह फीट का गोरा लंबा नौजवान था। ताशकंद एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही वो हमारी तरफ बढ़ा। टैक्सियों की लंबी कतार में लगी कार उसी की थी। उसे हमारा इंतजार था। बुखारा चलोगे। हमारे तीसरे साथी ने उज्बेक भाषा में कहा। सौदा तीन सौ डालर में तय हुआ। विद एसी। एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही हम अगले पांच मिनट में कार में बैठे थे। ताशकंद एयरपोर्ट ज्यादा बड़ा नहीं है। दिल्ली के टर्मिनल थ्री के मुकाबले ये उसका बीसवां हिस्सा भी नहीं है। अगर देश के किसी एयरपोर्ट से तुलना करें तो जयपुर और सूरत एयरपोर्ट भी इससे बड़े और भव्य नजर आते हैं। ताशकंद से बुखारा करीब पांच सौ पचास किलोमीटर दूर है। सफर लंबा था। हमारा तीसरी साथी अक्सर बिजनेस के सिलसिले में उज्बेकिस्तान जाता रहा है। दिल्ली का रहने वाला है लेकिन फर्राटेदार उज्बेकी बोलता है। वहां के कायदे कानूनों से भी भली भांति परिचित है। लंबे सफर को देखते हुए सोचा क्यों ना पानी की बोतल ले ली जाए। ड्राइवर ने साइड में कार रोक दी। दुकान पर छोटी बोतल थी नहीं लिहाजा पांच लीटर का कैन ले लिया। तीनों साथियों ने भर पेट पानी पिया। लगा ड्राइवर भी प्यासा है क्योंकि बैक मिरर में वो हमें...

देश भक्ति की आड़ में

सुबह के पांच बजे थे।। वो पांचों उस गेट पर खड़ी थी जो आनंद विहार बस अड्डे को रेलवे स्टेशन से जोड़ता है। सभी के हाथों में स्टैम्प साइज के तिरंगे थे जिनमें लगी पिनों को हर आने जाने वालों की शर्ट पर टांग रही थी। शांत अंदाज में नफासत भरे तरीके से लूट जारी थी। हर आने जाने वाले से वो पचास से सौ रुपये उगाही कर रही थी। आनंद विहार रेलवे स्टेशन दिल्ली के बाकी बड़े स्टेशनों की तरह अभी पूरी तरह आबाद नहीं है। कुछ गिनी चुनी ट्रेन ही यहां से आती जाती हैं। मुझे और मेरे साथी को सुबह सवा छह बजे रवाना होने वाली काठगोदाम शताब्दी पकड़नी थी। साथी के आने में देर थी लिहाजा स्टेशन के बाहर खड़ा हो उसका इंतजार कर रहा था। उनकी कारगुजारियां जारी थी और हर आने जाने वाले उऩका शिकार बन रहा था। पर उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था । मैं उनसे करीब दस कदम दूर खड़ा पिछले दस मिनट से उनकी कारगुजारी देख रहा था। अचानक उऩमें से एक मेरी ओर बढी। उसने जैसे ही मेरे कोट पर फ्लैग लगाना चाहा मैंने उसे डांट दिया। वो सकपका गई। बोली डांटते क्यों हो सर। नहीं लगवाना तो मत लगवाओ, ये कह वो लौट गई और बाकी शिकार की खोज में जुट गई। लूटमारी सरेआम थी...

मेट्रो में ममता

वो लगातार बच्चे पर प्यार उड़ेल रही थी। कभी उसे आंचल में समेट लेती तो कभी प्यार से उसके गाल पर चिकोटी काटती। बच्चा भी रह रह कर कभी अपना सिर महिला की गोद में रख लेता तो कभी अपने लटके पैरों को हिलाने लगता। आर के आश्रम स्टेशन से मेट्रो में चढ़ते ही मेरा ध्यान बड़ी सीट पर कोने में बैठे इन तीन लोगों पर गया। महिला बीच में थी। उसके दाएं ओर तीन साल की बच्ची और बाई तरफ करीब सात साल का ये सांवला लड़का बैठा था जिसे वो लगातार प्यार कर रही थी। लड़के का चेहरा मोहरा कुछ ऐसा था जैसे झारखंड के आदिवासी बच्चे होते हैं। हाफ स्लीव टी शर्ट पहने उस लड़के को स्किन की कोई गंभीर बीमारी थी। उसकी वजह से चेहरे और हाथ की स्किन उखड़ने लगी थी। बावजूद इसके वो लड़का महिला से हंस हंस कर बातें कर रहा था। और महिला भी अपना प्यार देने में कोई कसर नहीं छोड़ रही थी। पढ़ी लिखी वो सुन्दर महिला किसी खाते पीते परिवार से थी। आकर्षक पहनावा और रौबदार चेहरा। उम्र भी ज्यादा नहीं बस पच्चीस छब्बीस साल। बच्ची की शक्ल हूबहू मां पर गई थी। बिलकुल सुन्दर गुड़िया की माफिक। मेट्रो में आसपास खड़े कुछ लोगों का ध्यान उस प्यारी सी गुड़िया की ओर थ...

गरीब की जेब पर डाका

बिटिया की ट्यूशन क्लास खत्म होने में कुछ समय था। मैं मेट्रो से उतरा और सूरजमल स्टेडियम स्टेशन के बाहर कुछ टाइम काटने के मकसद से खड़ा हो गया। वहां दस बारह लोगों का झुंड पहले से ही मौजूद था। कुछ मटमैले रंग की ड्रेस में थे तो कुछ सादे कमीज पैंट में। पास ही उनकी वैन भी खडी थी जिस पर नीली फ्लैसिंग लाइट लगी थी । ये सभी डीटीसी के टिकट चैकर थे और झुंड बनाकर बेहद बेतरतीब तरीके से आती जाती बसों को रोक कर टिकट चैक कर रहे थे। किसी भी बस के रुकते ही कुछ चैकर टिकट जांचने के लिए पिछले गेट से चढते तो कई अगले गेट से उतर रहे लोगों पर छापामार शैली में हमला कर उन्हें पकड़ लेते । अगले गेट से उतरते ही वो लोगों को ऐसे घेर लेते थे जैसे पुलिस किसी बड़े अपराधी को धर दबोचती है। ये ग्रामीण पृष्ठभूमि का बेहद गरीब परिवार था । हरी वाली लो फ्लोर बस के रुकते ही परिवार अगले गेट से नीचे उतरा। परिवार के मुखिया की उम्र तीस बत्तीस साल रही होगी। एक पैर से अपाहिज होने के कारण वो हल्का लंगडा कर चल रहा था बावजूद इसके उसने दो साल के बच्चे को एक हाथ से गोद में थामा हुआ था। कई पैबंद लगी धोती पहने पीछे उसकी पत्नी थी जिसने करीब चा...

तेईस का तिलिस्म

तेईस पर मात्रा छोटी इ की आएगी। ये कहना था चौथी क्लास में बेटे को पढ़ाने वाली मैडम का। साठ नंबर के एग्जाम में मैडम आधा नंबर इसका काट चुकी थी। बेटे ने आंसर शीट पर तेईस को सही तरीके से तेईस ही लिखा था लेकिन मैडम ने उसके आगे क्रॉस लगाकर आधा नंबर काट लिया था। पैरेंट्स मीटिंग में मैडम ने बेटे की सभी विषयों की आंसर शीट दिखाई। बाकी सभी तो ठीक थी लेकिन हिन्दी की आंसर शीट पर तेईस को सही लिखने के बावजूद भी आधा नंबर काटा हुआ था। हर महीने के दूसरे शनिवार को होने वाली पैरेंट्स मीटिंग में अमूमन पत्नी जाती हैं। अपुन इस समय दफ्तर में होते हैं इसलिए ये ड्यूटी पत्नी की ही लगती है। लेकिन इस बार छुट्टी ले स्कूल पहुंच गए। मैडम की दलील थी कि तेईस पर मात्रा छोटी इ की ही आएगी क्योंकि सही शब्द तेइस है। अपनी गलती और अधूरे ज्ञान को सही साबित करने की कोशिश में वो इंग्लिश में गिटपिट करने लग जाती थी। हिन्दी की मात्रा पर इंग्लिश में बहस करना बिलकुल अटपटा लग रहा था लेकिन मैडम अपनी बात पर अड़ी थी। बाकी पैरेंट्स के सामने शायद उसे अपने अल्पज्ञान को स्वीकार करना मुश्किल पड़ रहा था। ये दूसरा वाक्या था जब इस मोहतरमा से मेरा...

किस्मत का मारा किसान

छाछ बिल्कुल गाढ़ी थी। कोई चार एक घंटे पहले बनाई होगी। उस पर जीरे का छौंक और हल्की सी हींग के कारण जायका बन गया था। पीतल के जिन बड़े गिलासों में छाछ हमें सर्व की गई थी वो भी आम शहरी गिलासों के मुकाबले दोगुने थे। सुबह के हल्के कुहासे के बीच खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की कुर्सियों पर अनजाने लोगों के बीच छाछ पीना नया अनुभव था। छाछ का हर घूंट हमें अमृत सरीखा लग रहा था। आप समय से आ गए, नहीं तो अब तक हम इसे भैंसो को पिला चुके होते, हमारे सामने खाट पर बैठे सज्जन ने कहा। गांव में इसे कोई नहीं पीता, मक्खन निकालने के बाद इसे चारे के साथ भैसों को दे देते हैं। लेकिन शहर में ऐसी ताजी छाछ कहां मिलती है। दूध थैलियों में आता है। मन हुआ तो दही जमा ली लेकिन छाछ कहीं नहीं मिलती, मैंने कहा। दिल्ली से जयपुर जाते हुए हम अचानक ही इस गांव में आ पहुंचे थे। दोस्त का पीएचडी का इम्तिहान था। हम तीन साथी अल सुबह अपनी कार से निकले थे। नीमराणा से आगे बढ़ते ही दोस्त ने कहा कहीं अच्छी चाय पी जाए। चाय तो रोज पीते हैं आज छाछ पीते हैं, मैंने कहा। पर छाछ मिलेगी कहां ? छाछ की तलाश में ही हाइवे से दो किलोमीटर दूर हम रजियाव...

गड्डों में देश

हिन्दुस्तान को गड्डों से काफी प्यार है। सुबह चिकनी सड़क बनती है, अगली सुबह वहां एक चौड़ा गड्डा बन चुका होता है। कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि कभी एलियन मिले तो वो पाताल में इन्हीं गड्डों के जरिये मिलेंगे। हिन्दुस्तान के जर्रे जर्रे में रोजाना इतने गड़डे खुदते हैं कि कहीं भी किसी भी गड्डे से एलियन निकल सकते हैं। नासा नाहक ही अरबों डॉलर खर्च कर अंतरिक्ष में एलियन की खाक छान रहा है । उसे भारतीय गड्डों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। रोचक ये है कि गड्डे चांद पर भी हैं और गोल्फ के मैदान में भी। चांद के गड्डे धरती से दिखते हैं, धरती के गड्डे चांद से। नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रखते ही भारतीय गड्डों की खूबसूरती का खूब आनंद लिया था। कुछ गड्डे दीर्घायु होते है तो कुछ पैदा होते ही भर दिए जाते हैं। जो पैदा होते ही भर दिए जाते हैं देर सवेर उनकी किस्मत में फिर खुदना लिखा होता है। गड्डे कई प्रकार होते हैं। ठेकेदार के जरिये कमीशन खाने के लिए बनाए गए गड्डे। फालतू बजट को निपटाने के लिए जबरदस्ती बनाए गए गड्डे, बाऱिश के दौरान सड़क धंसने से बनने वाले गड्डे और दूसरो के लिए खोदे गए गड्डे। जिस तरह का ...

संकट के बादलों में ध्रुव

ध्रुव हेलिकॉप्टर की दुर्घटनाओं में बुधवार को एक और हादसा जुड़ गया। जम्मू कश्मीर के बांदीपोरा जिले में सेना के ध्रुव हेलिकॉप्टरके दुर्घटनाग्र्रस्त होने पर इसे उड़ा रहे लेफ्टीनेंट कर्नल राज गुलाटी और मेजर ताहिर हुसैन खान की मौत हो गई। नियमित ट्रेनिंग पर निकला ये हेलिकॉप्टर उड़ान भरने के तीस मिनट बाद ही गिर गया। सेना ने हालांकि हादसे की जांच के आदेश दे दिए हैं लेकिन स्वदेशी एडवांस लाइट हेलिकॉप्टर ध्रुव लगातार देश और विदेशी धरती पर हादसों का शिकार हो रहा है। इस ताजे हादसे से दस दिन पहले ही इक्वाडोर सरकार वहां उसकी उड़ान पर लगा लगा चुकी है। इस साल 13 और 27 जनवरी को लगातार हुए दो हादसे के बाद इक्वाडोर वायुसेना ने अपने ध्रुव हेलिकॉप्टर के बेड़े को खड़ा कर दिया है। जिससे भारत को बड़ा झटका लगा है। वहां की सरकार ने इन हादसों की जांच के लिए एक कमेटी बनाई है। इक्वाडोर ने अपनी वायुसेना के लिए 2009 में सात ध्रुव हेलिकॉप्टर भारत से खरीदे थे जिनमें दो पहले और दो इस साल हादसे के शिकार हुए है। कुल मिलाकर इक्वाडोर के सात में से चार ध्रुव हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो चुके हैं। इन हादसों की जां...

कनफुसिया करेक्टर

धीरे से कान में बात कहने का हुनर हर किसी को नहीं आता। वैज्ञानिक ईबोला के इलाज के साथ इस पर भी गहराई से मंथन कर रहे हैं आखिर ये हुनर आता कहां से हैं ?   वैज्ञानिकों ने ऑक्सफोर्ड से लेकर आयरलैंड तक दुनिया की सभी बड़ी यूनिवर्सिटी के कोर्स छान मारे लेकिन कोई भी इसका क्रैश या डिप्लोमा कोर्स नहीं करवाती। फिर ऐसे शख्स कैसे किसी बात को,  किसी के कान में इतनी सफाई से कह देते हैं कि कहने वाले के होंठ भी नहीं हिलते और सुनने वालों को पता चल जाता है। ये कला नारद काल से चली आ रही है ऐसा कुछ ऐतिहासिक दस्तावेज कहते हैं लेकिन कलयुग में इस कला की इतनी मांग है कि इसके जानने वालों को हाथों हाथ लिया जाता है। बीसवीं सदी तक ऐसे लोगों को चुगलखोर कहा जाता था लेकिन वक्त बीतने के साथ ये शब्द असंसदीय लगने लगा। लिहाजा इक्कीसवीं सदी में अब इसकी जगह कनफुसिया नामक शब्द ने ले ली। एक से ज्यादा कनफुसिया एक समय में एक जगह पाए जाते हैं तो वो गैंग की शक्ल अख्तियार कर लेते हैं। जहां कनफुसिया गैंग होते हैं वहां ध्वनि प्रदूषण ना के बराबर होता है। ऐसे गैंग आंखों के जरिये आते जाते वातावरण में हर चलायमान ...