गरीब की जेब पर डाका

बिटिया की ट्यूशन क्लास खत्म होने में कुछ समय था। मैं मेट्रो से उतरा और सूरजमल स्टेडियम स्टेशन के बाहर कुछ टाइम काटने के मकसद से खड़ा हो गया। वहां दस बारह लोगों का झुंड पहले से ही मौजूद था। कुछ मटमैले रंग की ड्रेस में थे तो कुछ सादे कमीज पैंट में। पास ही उनकी वैन भी खडी थी जिस पर नीली फ्लैसिंग लाइट लगी थी । ये सभी डीटीसी के टिकट चैकर थे और झुंड बनाकर बेहद बेतरतीब तरीके से आती जाती बसों को रोक कर टिकट चैक कर रहे थे। किसी भी बस के रुकते ही कुछ चैकर टिकट जांचने के लिए पिछले गेट से चढते तो कई अगले गेट से उतर रहे लोगों पर छापामार शैली में हमला कर उन्हें पकड़ लेते । अगले गेट से उतरते ही वो लोगों को ऐसे घेर लेते थे जैसे पुलिस किसी बड़े अपराधी को धर दबोचती है। ये ग्रामीण पृष्ठभूमि का बेहद गरीब परिवार था । हरी वाली लो फ्लोर बस के रुकते ही परिवार अगले गेट से नीचे उतरा। परिवार के मुखिया की उम्र तीस बत्तीस साल रही होगी। एक पैर से अपाहिज होने के कारण वो हल्का लंगडा कर चल रहा था बावजूद इसके उसने दो साल के बच्चे को एक हाथ से गोद में थामा हुआ था। कई पैबंद लगी धोती पहने पीछे उसकी पत्नी थी जिसने करीब चार साल की छोटी बेटी का हाथ पकड़ा था। बड़ी बेटी पांच एक साल की रही होगी। उसने अपने वजन से भी भारी, कपडों से भरा एक गंदा बैग अपने कंधे पर लटकाया हुआ था। बैग की जिप खराब थी जिससे अंदर समाए कपड़े बाहर निकलने को आतुर थे लेकिन दो सेफ्टी पिनों की मदद से बैग को काफी हद तक बंद करने की कोशिश की गई थी। बस से उतरते ही चैकरों के झुंड ने परिवार के मुखिया से टिकट मांगा। अचानक हुए इस हमले से परिवार का मुखिया हक्का बक्का रह गया। पहले तो उसे कुछ समय ही नहीं आया फिर उसने खुद को संभालते हुए कहा कि टिकट उनके पास नहीं है। इतना कहते ही चैकरों ने एक दूसरे को देखा। उनके चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि का भाव था । परिवार के मुखिया ने गिड़गिड़ा कर दलील दी कि वो पहली बार दिल्ली आए हैं और गांव की बस की तरह उन्हें डीटीसी बस में कोई टिकट देने आया ही नहीं। पर उनमें से कोई उसकी सुनने को तैयार ही नहीं था। इस पूरी कवायद में गोद में मौजूद बच्चा, उसकी मां और दोनों बहनें पूरी तरह सहम गए। फिर शुरू हुआ परिवार के मुखिया की जेब तलाशी का दौर। चैकरों ने उसकी कमीज और पैंट की सभी जेबें छान मारी। कुल मिलाकर तीन सौ दस रुपये निकले। इनमें से एक चैकर ने दो सौ रुपये अपने हाथ में पकड़े छोटे से काले लैदर बैग में रखे और बाकी एक सौ दस अपनी पैंट की जेब में। मुझे दाल में कुछ काला नजर आया। इसी दौरान एक दूसरे चैकर ने फाइन के नाम पर एक पर्ची काटकर परिवार के मुखिया को पकड़ानी चाही लेकिन बीच में मैं कूद गया। अब वो पर्ची मेरे हाथ में थी। अचानक मेरे सीन में आने से उन्हें एक पल तो समझ ही नहीं आया। उन्होंने पर्ची मेरे हाथ से लेनी चाही लेकिन नाकाम रहे। मैंने पर्ची पर नजर डाली तो उस पर दौ सौ रुपये लिखे थे। मैंने सवाल किया कि उसने दिए तो तीन सौ दस रुपये हैं फिर पर्ची दौ सौ की क्यों ? इसने दौ सौ रुपये ही दिए हैं, उनका जवाब था । मैंने कहा इसने तीन सौ दस रुपये दिए हैं और उनकी पूरी कारगुजारी को मैंने दूर खडे होकर अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लिया है। मेरा इतना कहते ही उनके चेहरे की रंगत उड़ गई। मैंने उनके सामने ही परिवार के मुखिया से पूछा कि उन्होंने उसकी जेब से कितने पैसे निकाले। उसने कहा तीन सौ दस। इतना सुनते ही सभी चैकर खींसे निपोरने लगे। मैंने उन्हें गरियाना शुरू किया। तुम्हें शर्म आनी चाहिए। डीटीसी तो वैसे ही बर्बाद है। क्यों अब इसे बंद करवाके रहोगे। ये अपाहिज आदमी किसी तरह से कमा कर अपने परिवार को पालता होगा और तुम्हें इससे लूट खसोट करते हुए शर्म आनी चाहिए वगैरहा वगैरहा। जिस चैकर ने एक सौ दस रुपये अपनी जेब में रखे थे, उसने वो निकाले । मैंने वो रुपये परिवार के मुखिया को वापस करवाए। मैंने देखा परिवार के मुखिया की आंखों नम हो चुकी थी। पता नहीं ये डर के आंसू थे या कृतज्ञता के। हो सकता हो उसे लगा कि इस बैगाने शहर में भी कोई आपके साथ आकर खड़ा हो सकता है । साथ ही उसे मैंने दो नसीहत दी कि कभी भी, किसी भी काम के जितने रुपये दो, उसकी रसीद जरूर लो। दूसरे ये दिल्ली है यहां टिकट देने कंडक्टर नहीं आता बल्कि आपको भीड़ चीरकर उस तक पहुंचना होता है। खैर वो परिवार जा चुका था। मुझे भी बेटिया को ट्यूशन क्लास से लेकर घर जाना था। टिकट चैकर भी फिर अपने धंधे में लग चुके थे। मैं सोचता चल रहा था कि ऐसे कितने मुर्गे ना जाने उनके जाल में फंसते होंगे। क्या इंसानियत और आदमी का जमीर पैसे के आगे पूरी तरह मर चुका है?

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