देश भक्ति की आड़ में
सुबह के पांच बजे थे।। वो पांचों उस गेट पर खड़ी थी जो आनंद विहार बस अड्डे को रेलवे स्टेशन से जोड़ता है। सभी के हाथों में स्टैम्प साइज के तिरंगे थे जिनमें लगी पिनों को हर आने जाने वालों की शर्ट पर टांग रही थी। शांत अंदाज में नफासत भरे तरीके से लूट जारी थी। हर आने जाने वाले से वो पचास से सौ रुपये उगाही कर रही थी।
आनंद विहार रेलवे स्टेशन दिल्ली के बाकी बड़े स्टेशनों की तरह अभी पूरी तरह आबाद नहीं है। कुछ गिनी चुनी ट्रेन ही यहां से आती जाती हैं। मुझे और मेरे साथी को सुबह सवा छह बजे रवाना होने वाली काठगोदाम शताब्दी पकड़नी थी। साथी के आने में देर थी लिहाजा स्टेशन के बाहर खड़ा हो उसका इंतजार कर रहा था।
उनकी कारगुजारियां जारी थी और हर आने जाने वाले उऩका शिकार बन रहा था। पर उन्हें रोकने वाला कोई नहीं था । मैं उनसे करीब दस कदम दूर खड़ा पिछले दस मिनट से उनकी कारगुजारी देख रहा था। अचानक उऩमें से एक मेरी ओर बढी। उसने जैसे ही मेरे कोट पर फ्लैग लगाना चाहा मैंने उसे डांट दिया। वो सकपका गई। बोली डांटते क्यों हो सर। नहीं लगवाना तो मत लगवाओ, ये कह वो लौट गई और बाकी शिकार की खोज में जुट गई। लूटमारी सरेआम थी पर देशभक्ति की आड़ में ।
उस शख्स ने नीले रंग का ट्रैक सूट पहना हुआ था। बारीक कटिंग, चेहरे और चाल ढाल से लगता था कि जैसे नया नया पुलिस या सेना में भर्ती हुआ है। हाथ में सूटकेस लिए स्टेशन की ओर बढ़ रहा था। अचानक पांचों में से एक ने तिरंगा उस युवक के ट्रैक सूट के अंदर झांक रही शर्ट पर लगा दिया। नौजवान एक बार सकपकाया। उसने एक नजर युवती और एक अपनी शर्ट पर टंग चुके तिरंगे पर डाली। युवती ने उससे पैसे मांगे उसने दस रुपये दे दिए। युवती ने उसे सलीके से सुना दी और पचास रुपये लेकर ही मानी।
अचानक नीली फ्लैश लाइट घूमाती एक चमचमाती इनोवा वहां आकर रूकी। ये पुलिस कंट्रोल रूम यानि पीसीआर की गाड़ी थी। पांचों ने उसे जाकर घेर लिया। इनोवा में अगली सीट पर बैठे पुलिस वाले ने ग्लास नीचे किया। बस फिर क्या था उन पांचों और आगे बैठे सिपाही और ड्राइवर में हंसी ठहाकों का दौर शुरू हो गया। ना किसी का खौफ ना किसी का डर। ये एपिसोड करीब पांच मिनट तक चला। इस दौरान तीन तो फिर काम पर लग गई जबकि दो अभी भी पुलिस वाले से बातों में मशगूल थी। पास से चाय बेचने वाला गुजरा तो सभी ने उससे चाय ले ली। अब चाय की चुस्कियों के साथ अट्टहास जारी था। कुछ देर बाद इनोवा चली गई और वो बाकी दो भी फिर लोगों को लूटने के काम में लग गई। मैंने खुद से सवाल किया कि क्या कानून भी रात में सो जाता है जो यात्री यूं सरेआम लूट रहे हैं।
इनसे कुछ कदम दूर ऑटो में कुछ लड़कियां बैठी थी। वो हर आने जाने वाले को अश्लील इशारे कर बुला रही थी। कुछ लोग उनके झांसे में फंस जाते थे तो उन्हें ले ऑटो वाले रफूचक्कर हो जाते थे।
कुछ ऐसा ही हाल बस अड्डे का था। रात में ऑटो अंदर तक वहां पहुंच जाते हैं जहां रोडवेज बसों से सवारी उतरती है। दिन में उन आटो वालों को जहां जाने की इजाजत नहीं होती रात में वो अंदर कैसे पहुंच जाते हैं। क्या दिन में कानून अलग है और रात में अलग। बसों से उतरती सवारियों पर ऑटो वाले ऐसे झपट्टा मारते हैं जैसे शिकार पर चील। प्रीपेड स्टैंड तक तो सवारी पहुंच ही नहीं पाती इससे पहले ही ऑटो वालों का शिकार बन जाती है। किसी को रास्ते में लूट लिया जाता है तो किसी को लंबे चौडे रास्ते से ले जाकर मोटा बिल मांगा जाता है। जरूरत है व्यवस्था के पालन की। जब कानून है तो उसका पालन भी होना चाहिए ताकि गरीब यात्री किसी भी लूटमारी का शिकार होने से बच सके।
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