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कौन चूस रहा है खून। सरकार, मच्छर या अस्पताल?

इमरजेंसी में पहुंचते ही डॉक्टर भतीजे को आईसीयू में भर्ती करने पर तुला हुआ था। मैंने डॉक्टर से कहा कि आईसीयू की जरूरत क्या है। आप सामान्य वार्ड में भर्ती कर इलाज शुरू कीजिये लेकिन वो मानने को तैयार नहीं था। उसने मोबाइल से अपने सीनियर को फोन किया। उसने बताया कि ये टेस्ट लिख दिये हैं। क्या और कोई टेस्ट भी करवाने हैं? डॉक्टर ने उसे तीन टेस्ट और बता दिए। उसने वो भी लिख दिए। फोन रखने के बाद वो फिर आईसीयू में भर्ती करने पर अड़ गया। “मरीज की हालत बिगड़ती जा रही है। आईसीयू में भर्ती करना जरूरी है। जल्दी फैसला कीजिये“ डॉक्टर बोला। “लेकिन मरीज तो सही है और हमारे साथ चलकर इमरजेंसी तक आया है। आप भर्ती कर इलाज शुरू कीजिये” मैंने कहा । डॉक्टर कुछ माना और इस बार सेमी आईसीयू में रखने की जिद करने लगा। दसवीं में पढ़ने वाले चौदह साल के भतीजे को चार दिनो से हाई फीवर और उल्टी दस्त बने हुए थे। पास के काबिल डॉक्टर को दिखाया तो उसने दवा दे डेंगू का टेस्ट करवाने को कहा। डेंगू की रिपोर्ट नगेटिव आई और प्लेटलेट की संख्या नब्बे हजार। लेकिन चार दिनों तक जब बुखार में आराम नहीं हुआ और रात में उल्टी दस्त बढ़ गए तो हम भ...

ई वॉलेट की कहानी

एक बार देख लीजिये कि आपके ई वॉलेट में पैसे आए कि नहीं? मरीज के मुंह में झांक रहे डेंटिस्ट से मैंने कहा। डेंटिस्ट ने अपने औजार एक तरफ रखे और मोबाइल उठा कर चेक किया। सहमति में गर्दन हिलाई। पैसे उनके ई वॉलेट एकाउंट में पहुंच चुके थे। मैंने ये पैसे वहीं बैठकर अपने क्रेडिड कार्ड से ई वॉलेट से ट्रांसफर किए थे। इस प्रक्रिया में वन टाइप पासवर्ड आने और पैसे ई वॉलेट में जुड़ने में दस मिनट लग गए। इस दौरान डेंटिस्ट कई बार मुझ पर और सरकार पर झल्ला चुका था। बताओ कोई बात है? सरकार ने अच्छा भला झंझट खड़ा कर दिया। हर पेशंट ऐसा करने लगे तो चल गया हमारा काम? इतने में तो आप जेब से पैसे निकाल कर चले भी गए होते। उसने तल्खी भरे स्वर में कहा। मैंने कहा आप कार्ड स्वाइप मशीन क्यों नहीं लगवा लेते? वो उसके लिए करंट एकाउंट चाहिए होता है ना? उन्होंने जवाब दिया? क्या आपके पास करंट एकाउंट नहीं है? मैंने चौकते हुए कहा। वो मुस्कुराए और बोले अभी अप्लाई किया है। बैंकों के पास काम ज्यादा हैं ना इसलिए देरी हो रही है। एक हफ्ते में करंट एकाउंट खुल जाएगा तब उसके बाद स्वाइप मशीन लगा लेंगे। दरअसल दांत में पिछले दो हफ्ते से द...

सादी शादी का सबक

जितनी बड़ी शादी उतनी बड़ी चर्चा। हमारे देश में बड़ी शादियां महीनों पहले ही मीडिया की सुर्खियां बनने लगती हैं। टीवी चैनल बारीक से बारीक से जानकारी परोसने लगते हैं। मेहमान कैसे आएंगे ? कहां ठहरेंगे ? भोजन में क्या क्या परोसा जाएगा वगैरहा वगैरहा । पर क्या ये सही है? शायद ही किसी भव्य शादी और उसमें बेहिसाब खर्च की आलोचना की जाती हो। वो भी उस देश में जहां आज भी तीस करोड़ लोग रात को भूखे पेट सोते हों ? बात सही है कि देश में आज भी सत्तर फीसदी परिवार रोजाना डेढ़ सौ रुपये से भी कम में अपना गुजर बसर करते हैं। फिर क्यों भड़कीली शादियों में हजारों करोड़ रुपये खर्च नहीं बहाए जाते हैं? बड़ी शादियों की तो छोड़िये हमारे यहां मध्यम वर्गीय विवाह समारोह में भी छप्पन तरह की डिश परोसी जाती हैं। इन आयोजनों में कई डिश ऐसी होती है जिन्हें कोई छूता भी नहीं। ये डिश या सब्जी खाने की टेबल पर लगा तो दी जाती है लेकिन किसी के ना छुने के कारण उन पर मोटी परत बन जाती है। आप कितने ही भूखे क्यों ना हो ज्यादा से ज्यादा कितनी डिश टेस्ट कर सकते हैं। दो, चार, छह, आठ या फिर दस, बस। कोई कितना खा सकता है? सौ ग्राम दो सौ ग...

सरकारी दफ्तर में खर्चा पानी

रजिस्ट्री के कागज और फॉर्म लेते ही मैडम ने एक नजर मेरी ओर डाली और सामने रखे कैलकुलेटर पर हिसाब करने लगी। दो सैकेंड रूकी और फिर खुद पर झल्ला कर दुबारा कैलकुलेटर पर जोड़ घटा करने लगी। बारह हजार पांच सौ उसने कहा। मैंने तुरंत रकम पकड़ा दी। उसने गिने और साथ रखी तिजोरी में रख लिए। उसने मेरे कागजों की इंट्री वहां रखे मोटे से रजिस्टर में की और मुहर लगा कर मुझे पकड़ा दिए। अगली खिड़की पर पहुंचा तो उस स्लीप पर नजर दौड़ाई जो मैडम ने मुझे पकड़ाई थी। उसमें रकम ग्यारह हजार नौ सौ पैंतीस लिखी थी। फिर उसने बारह हजार पांच सौ क्यों लिये? मैं उलटे पैर मोहतरमा के पास लौटा। “मैडम इसमें तो इतनी रकम लिखी है आपने ज्यादा क्यों लिए” मैंने कहा। “पांच सौ रुपये ऑफिस का खर्चा होता है। सभी से लेते हैं” उसने बेहिचक जवाब दिया। “लेकिन ऑफिस तो सरकारी है फिर खर्चा कैसा? आप पैसे रख लीजिये बस मुझे पर्ची दे दीजिये” मैंने कहा। इस बार उसने हैरत से मुझे देखा। उसने नहीं वहां मौजूद बाकी लोग भी मुझे उसी नजर से देख रहे थे जैसे मैं पहली बार रजिस्ट्रार दफ्तर आया हूं। हकीकत भी ये थी कि मैं पहली बार आया था। कभी वहां जाने का वास्ता ही नह...

स्कूल वाउचर से आएगा शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव

हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका से 70 किलोमीटर दूर एक गांव में रहने वाली फातिमा आम बच्चों की तरह ही है। कक्षा 10 में पढ़ने वाली फातिमा एक कपड़ा मजदूर की बेटी है। उसके वालिद की इतनी हैसियत नहीं कि उसकी पढ़ाई का खर्चा उठा सके। बावजूद इसके फातिमा पिछले दस सालों से हर रोज मुस्कुराते हुए स्कूल जाती है। उसकी पढ़ाई वहां की सरकार की वाउचर प्रणाली के कारण मजे से चल रही है। उसे हर महीने 36 डॉलर यानी 2800 टका वहां की करेंसी में मिलते हैं। उसकी पढ़ाई पर जो खर्च आता है उसे बांग्लादेश सरकार सीधे उसके बैंक खाते में डाल देती है। 1993 में शुरू हुए बांग्लादेश फीमेल सैकेंडरी स्कूल असिस्टैंस प्रोजेक्ट के तहत लड़कियों को सीधे वाउचर प्रणाली से पैसा दिया जा रहा है। इसके तहत बांग्लादेश के 118 जिलों में कक्षा 6 में दाखिला लेने वाली छात्राओं को 12 डॉलर यानी करीब 936 टका से कक्षा 10 तक 2800 टका दिए जा रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से वहां की शिक्षा व्यवस्था पर जबरदस्त सकारात्मक असर पड़ा है। इससे वहां स्कूलों का खर्च तो घटा ही है, साथ ही बांग्लादेश जैसे विकासशील मुल्क में महिला साक्षरता दर भी बढ़ी है। गर...

किस्मत का मारा किसान

छाछ बिल्कुल गाढ़ी थी। कोई चार एक घंटे पहले बनाई होगी। उस पर जीरे का छौंक और हल्की सी हींग के कारण जायका बन गया था। पीतल के जिन बड़े गिलासों में छाछ हमें सर्व की गई थी वो भी आम शहरी गिलासों के मुकाबले दोगुने थे। सुबह के हल्के कुहासे के बीच खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की कुर्सियों पर अनजाने लोगों के बीच छाछ पीना नया अनुभव था। छाछ का हर घूंट हमें अमृत सरीखा लग रहा था। आप समय से आ गए, नहीं तो अब तक हम इसे भैंसो को पिला चुके होते, हमारे सामने खाट पर बैठे सज्जन ने कहा। गांव में इसे कोई नहीं पीता, मक्खन निकालने के बाद इसे चारे के साथ भैसों को दे देते हैं। लेकिन शहर में ऐसी ताजी छाछ कहां मिलती है। दूध थैलियों में आता है। मन हुआ तो दही जमा ली लेकिन छाछ कहीं नहीं मिलती, मैंने कहा। दिल्ली से जयपुर जाते हुए हम अचानक ही इस गांव में आ पहुंचे थे। दोस्त का पीएचडी का इम्तिहान था। हम तीन साथी अल सुबह अपनी कार से निकले थे। नीमराणा से आगे बढ़ते ही दोस्त ने कहा कहीं अच्छी चाय पी जाए। चाय तो रोज पीते हैं आज छाछ पीते हैं, मैंने कहा। पर छाछ मिलेगी कहां ? छाछ की तलाश में ही हाइवे से दो किलोमीटर दूर हम रजियाव...

देसी शादी, विदेशी मेहमान

बारात पूरे शवाब पर थी। बाजे वाले पूरी ताकत से बजा रहे थे तो बाराती उससे ज्यादा जोर लगाकर नाच रहे थे। कहीं नागिन डांस चल रहा था तो कोई ढोल की थाप पर झूम रहा था। इन सबके बीच दूल्हे मियां बग्गी पर बैठे मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। ऐसा पूरे एक घंटे से चल रहा था और बारात चंद कदम ही बढ़ पाई थी। नोएडा के जिस सेक्टर में ये बारात आई थी वो चारों ओर गांव से घिरा है। जहां ये सेक्टर बना वहां कभी इस गांव के खेत हुआ करते थे। कहने को ये गांव है पर यहां जरूरत की हर वो चीज मौजूद है जो शहर में होती है। इसी गांव की पोस्ट ग्रेजुएट लड़की से हमारे घनिष्ठ साथी की शादी हो रही थी। इस शादी के लिए हमारे सर्कल में आए एक नए मित्र को भी सपरिवार निमंत्रण मिला। वो अपनी स्पैनिश पत्नी और दो बच्चों के साथ शादी में शामिल होने को तैयार थे लेकिन उनकी एक दिक्कत थी। उनकी पत्नी की एक महिला मित्र भी स्पेन से आकर उनके घर ठहरी हुई थी। दोस्त अपने परिवार के साथ शादी में जाना चाहते थे पर परेशान थे कि इस दौरान अपनी पत्नी की मित्र को कहां ठहराएं। उन्होंने अपनी ये प्रॉब्लम साझा की तो हमने सलाह दी उसे भी विवाह समारोह में ले चलो। बारातियों क...