ई वॉलेट की कहानी

एक बार देख लीजिये कि आपके ई वॉलेट में पैसे आए कि नहीं? मरीज के मुंह में झांक रहे डेंटिस्ट से मैंने कहा। डेंटिस्ट ने अपने औजार एक तरफ रखे और मोबाइल उठा कर चेक किया। सहमति में गर्दन हिलाई। पैसे उनके ई वॉलेट एकाउंट में पहुंच चुके थे। मैंने ये पैसे वहीं बैठकर अपने क्रेडिड कार्ड से ई वॉलेट से ट्रांसफर किए थे। इस प्रक्रिया में वन टाइप पासवर्ड आने और पैसे ई वॉलेट में जुड़ने में दस मिनट लग गए। इस दौरान डेंटिस्ट कई बार मुझ पर और सरकार पर झल्ला चुका था। बताओ कोई बात है? सरकार ने अच्छा भला झंझट खड़ा कर दिया। हर पेशंट ऐसा करने लगे तो चल गया हमारा काम? इतने में तो आप जेब से पैसे निकाल कर चले भी गए होते। उसने तल्खी भरे स्वर में कहा। मैंने कहा आप कार्ड स्वाइप मशीन क्यों नहीं लगवा लेते? वो उसके लिए करंट एकाउंट चाहिए होता है ना? उन्होंने जवाब दिया? क्या आपके पास करंट एकाउंट नहीं है? मैंने चौकते हुए कहा। वो मुस्कुराए और बोले अभी अप्लाई किया है। बैंकों के पास काम ज्यादा हैं ना इसलिए देरी हो रही है। एक हफ्ते में करंट एकाउंट खुल जाएगा तब उसके बाद स्वाइप मशीन लगा लेंगे। दरअसल दांत में पिछले दो हफ्ते से दर्द था। डेंटिस्ट को देने के लिए नई करंसी थी नहीं लिहाजा टालता आ रहा था। पर जब उस दिन दर्द असहनीय हो गया था तो हार कर डेंटिस्ट को फोन लगा दिया। दांत के दर्द के साथ करंसी का दर्द भी उन्हें बता डाला। नाम से उन्होंने पहचान लिया और बीस सालों के हमारे डॉक्टर मरीज के रिश्ते को देखते हुए मेरे सुझाव पर वॉलेट से पैसे लेने को तैयार हो गए। घर से दूर होने के बावजूद बरसों से इसी डेंटिस्ट के पास जाने की कई वजहें हैं। ये काम तसल्ली बख्श करते हैं तो लिहाजा इसकी ली हुई ज्यादा फीस भी नहीं चुभती। हर मरीज के मुंह में औजारों का अलग सेट इस्तेमाल करते हैं। नया पेशंट, अलग औजार। अपॉइंटमेंट लेने के बाद भी नंबर के इंतजार में घंटा, दो घंटा बैठना ही पड़ता है? पचास की उम्र पार पति पत्नी दोनों अच्छे डेंटिस्ट हैं। दोनों के पास एमडीएस के साथ पता नहीं विदेश से हासिल क्या क्या डिग्री है? चार घंटें सुबह और चार घंटे शाम को क्लिनिक पर बैठते हैं। पति मेल मरीजों को दखते हैं तो पत्नी ज्यादातर महिलाओं को। पति का हाथ ज्यादा सधा हुआ है। खुद के घर में बनाए क्लिनिक में काम करते हैं। घर क्या आलीशान कोठी है? नीचे का हिस्सा डेंटल क्लिनिक है और ऊपर की दो मंजिलों पर उनका आशियाना। रेस्पेशनिस्ट है जो फोन उठाने के साथ मरीजों के पर्चें डेंटिस्ट तक पहुंचाती है। क्लिनिक में चार डेंटल चेयर है। दोनों चारों चेयर पर घूम घूम कर काम करते हैं। एक साथ चार मरीज देखते हैं। डेंटिस्ट और उनकी पत्नी जब अलग अलग मरीजों को देखते हैं तो दो दो सहायक आसपास मदद के लिए खडे होंते हैं। साफ सुथरा क्लिनिक है जिसमें दाखिल होने से पहले जूते चप्पल बाहर निकलवा ली जाती है। आप अंदर उनकी दी हुई खास चप्पलों में जा सकते है। कुल मिलाकर पूरा तामझाम है। नोटबंदी से पहले दोनों अच्छा खासा कमाते होंगे लेकिन सब अपनी जेब में। सरकार को कोई टैक्स नहीं। ना सेल टैक्स, ना कोई वैट। जब करंट एकाउंट ही नहीं है तो इनकम टैक्स रिटर्न कितने की भरें। या फिर ना भी भरें, कोई सवाल करने वाले नहीं है। जब कमाई किसी रिकॉर्ड में ही नहीं है तो कैसा टैक्स ?

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