किस्मत का मारा किसान
छाछ बिल्कुल गाढ़ी थी। कोई चार एक घंटे पहले बनाई होगी। उस पर जीरे का छौंक और हल्की सी हींग के कारण जायका बन गया था। पीतल के जिन बड़े गिलासों में छाछ हमें सर्व की गई थी वो भी आम शहरी गिलासों के मुकाबले दोगुने थे। सुबह के हल्के कुहासे के बीच खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की कुर्सियों पर अनजाने लोगों के बीच छाछ पीना नया अनुभव था। छाछ का हर घूंट हमें अमृत सरीखा लग रहा था। आप समय से आ गए, नहीं तो अब तक हम इसे भैंसो को पिला चुके होते, हमारे सामने खाट पर बैठे सज्जन ने कहा। गांव में इसे कोई नहीं पीता, मक्खन निकालने के बाद इसे चारे के साथ भैसों को दे देते हैं। लेकिन शहर में ऐसी ताजी छाछ कहां मिलती है। दूध थैलियों में आता है। मन हुआ तो दही जमा ली लेकिन छाछ कहीं नहीं मिलती, मैंने कहा। दिल्ली से जयपुर जाते हुए हम अचानक ही इस गांव में आ पहुंचे थे। दोस्त का पीएचडी का इम्तिहान था। हम तीन साथी अल सुबह अपनी कार से निकले थे। नीमराणा से आगे बढ़ते ही दोस्त ने कहा कहीं अच्छी चाय पी जाए। चाय तो रोज पीते हैं आज छाछ पीते हैं, मैंने कहा। पर छाछ मिलेगी कहां ? छाछ की तलाश में ही हाइवे से दो किलोमीटर दूर हम रजियावास नाम के इस गांव में आ पहुंचे थे। कोई जान पहचान नही थीं। अचानक एक घर का दरवाजा खटखटा दिया। कंबल ओढ़े एक साहब ने दरवाजा खोला। मैंने कहा राम राम। राम राम, हां बताओ, उन साहब ने कहा। छाछ मिलेगी क्या ? वो हमारी इस अजीब फरमाईश से हैरत में थे। उन्होंने एक नजर हम पर डाली और घर के अंदर ले लाए। बोले, देखता हूं छाछ है कि नहीं। उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा। छाछ थी। उन्होंने बड़े अदब से हमें अपने आंगन में बिठाया। शायद जान ना पहचान मैं तेरा मेहमान जैसा मुहावरा ऐसे ही मौके के लिए गढ़ा गया होगा। वो बोले कैसे पियेंगे? गुड़ के या नमक के साथ। दोस्त ने कहा अगर नमक डाल कर जीरे का छौंक लग जाए तो मजा आ जाए। उनके चेहरे पर मुस्कुराहट तैरी। बोले बिल्कुल लग जाएगा। उनकी पत्नी छाछ बनाने में लग गई । वो हमारे साथ बातचीत में मशगूल हो गए। उनका नौजवान बेटा भी साथ आकर बैठ गया। वो एक किसान का घर था। उनकी पीड़ा ये थी कि गांव के किसानों की जमीन सरकार ने अधिग्रहित कर बड़ी कंपनियों को दे दी है। किसानों को मुआवजे के नाम पर कौड़ी मिली जबकि सरकार ने कंपनियों से मोटी रकम उगाही। इन कंपनियों के वेयर हाउस गांव की दहलीज तक आ पहुंचे हैं। जिन किसानों की जमीन बच गई वो खेती तो करना चाहते हैं लेकिन बिजली पानी की दिक्कत है। पानी जमीन से 125 फीट नीचे है। खेती किसी तरह हो भी जाती है तो कटाई के लिए मजदूर मिलना दूभर है। अगर मजदूर मिल भी जाते हैं तो इतना पैसा मांगते हैं कि किसान की लागत भी नहीं निकल पाती। कुल मिलाकर अन्न पैदा करने वाला ठन ठन गोपाल रह जाता है। इस ट्रैक्टर को क्या आप चलाते हो? वहां खड़े ट्रैक्टर की ओर इशारा करते हुए हमने साथ बैठे किसान के बेटे से पूछा। नहीं इसे चलाना ही नहीं आता, जवाब किसान ने दिया। फिर ये क्या करते हैं? दोस्त ने पूछा। कुरियर कंपनी में काम करता हूं। इस बार जवाब किसान के बेटे ने दिया। बीए करने के बाद जब कहीं सरकारी नौकरी नहीं मिली तो तो प्राइवेट जॉब करने लगा। खेती महज एक बीघे की बची है। इसमें दो लोग लगें तो गुजारा नहीं होता इसलिए मैं यहां से बीस किलीमीटर दूर नीमराणा की एक कुरियर कंपनी में काम करता हूं। सात हजार रुपये देते हैं। कुछ पापा कमाते हैं, इसमें पूरे परिवार का गुजारा हो जाता है। बेटे ने जवाब दिया। बातचीत इतने आत्मीय माहौल में चल रही थी कि लगता नहीं था कि हम एक दूसरे के लिए अनजान हैं। हमारे गिलासों की छाछ भी खत्म हो चुकी थी। हमें आगे का सफर भी तय करना था। हमनें इजाजत मांगी तो वो खाने की जिद करने लगे। बोले खाना खाकर जाना। हमने लंबे सफर की दुहाई थी। वो बाप बेटे हमें छोड़ने बाहर तक आए। हम तीनों जयपुर पहुंच चुके थे लेकिन मन वहीं था। दिल में रह रहकर सवाल आ रहा था कि शहरों में ऐसी आत्मीयता क्यों नहीं है।
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