पुलिस उसकी सरकार जिसकी

“चौंतीस साल नौकरी को हो गए। सिपाही भर्ती हुआ था और आज भी सिपाही ही हूं। मेरे साथ जो भर्ती हुए थे आज वो इंस्पेक्टर बन गए लेकिन मेरे कंधे पर कोई स्टार नहीं है”। उसने अपने कंधे की ओर देखते हुए तल्खी भरी आवाज में कहा। “मेरी गलती ये है कि मैं ड्राइवर भर्ती हुआ था। यूपी में ड्राइवर को प्रमोशन नहीं है। भले ही मुझे पे स्केल इंस्पेक्टर का मिल रहा है लेकिन साहब ये तो सिर्फ मैं जानता हूं। सलाम तो वर्दी को मिलता है और वर्दी में आज भी सिपाही की ही पहनता हूं।“ बावन साल उम्र का वो खाकी वर्दीधारी आईजी मेरठ का ड्राइवर था। कान के पास कुछ बालों को छोड़ दिया जाए तो बाकी काले थे। आम पुलिसिया लोगों के विपरीत शरीर चुस्त, पेट सामान्य और आखें तेज। चश्मा अभी लगा नही था। बातचीत के लहजे से लग रहा था कि उन्होंने अपनी नौकरी से काफी कुछ सीखा है। आईजी का ये ड्राइवर अचानक हमारे साथ आकर खड़ा हो गया और हमारी बातचीत का हिस्सा बन गया था। तीन घंटे के एग्जाम में बच्चे तो अंदर सेंटर में परीक्षा दे रहे थे लेकिन हम सभी पेरेंट्स बाहर चाय की एक दुकान पर गप्पे मार रहे थे। बात कभी राजनीति की ओर लुढ़क जाती तो कभी देश के विकास पर। मुद्दे अनेक थे और बात करने वाले हम सात। आईजी की बेटी भी एग्जाम देने आई थी। परीक्षा खत्म होने से पहले ही उनकी नीली बत्ती लगी सफेद एम्बेस्डर कार आकर एग्जाम सेंटर के बाहर खड़ी हो गई। आईजी और उनकी पत्नी ने तो कार में बैठे इंतजार करना मुनासिब समझा लेकिन ड्राइवर वहां आ पहुंचा जहां हमारी महफिल जमी थी। योगी सरकार बनने के बाद क्या यूपी पुलिस में कुछ बदलाव आया है। ये सवाल हमारे बीच के एक साथी ने ड्राइवर की ओर दाग दिया। वो कुछ पल रुके और बोले। “पुलिस उसकी सरकार जिसकी। सरकारें आती है और पुलिस को अपनी मर्जी के मुताबिक इस्तेमाल करती हैं। पुलिस भी कल तक जिस नेता के आगे पीछे घूमती थी सरकार का आदेश मिलने पर उस पर पिल पड़ती है। हम तो आदेश के गुलाम हैं। बस ये देखते हैं कि आदेश कहां से आया है? उस पर दिमाग लगाना हमारा काम नहीं। हम तो हुक्म के गुलाम हैं। जो आता है, हमें इस्तेमाल करता है और चलता बनता है। हमारी दिक्कतों से उसे कोई सरोकार नहीं। अफसर भी कुछ नहीं बोलते। उन्हें अपनी नौकरी बचाने की पड़ी होती है, ऐसे में मेरे जैसा आदमी सिपाही ही भर्ती होता है और सिपाही ही रिटायर हो जाता है”। ड्राइवर ने मुस्कुराते हुए कहा। “अपनी नौकरी में मैंने थानों की गाड़ी से लेकर तमाम बड़े अफसरों की कारें चलाई हैं। नौकरी में बने रहने के लिए अफसर नेताओं से लेकर आला अफसरों तक क्या तिकड़म भिड़ाते हैं मुझ से बेहतर कोई नहीं जानता। लेकिन आज तक ऐसा कोई अफसर नही मिला जो हमारी भी सुध लेता। दंगों में हमें अक्सर लाठी के भरोसे झोंक दिया जाता है। कई बार बंदूकें साथ होती हैं तो फायरिंग की इजाजत नहीं होती। ऐसे में मार खाने और मरने के सिवा हमारे पास कोई चारा नहीं होता पर नौकरी है साब क्या करें।“ ड्राइवर ने अपनी घड़ी में टाइम देखते हुए कहा। “नए अफसरों में गुस्सा ज्यादा है। वो व्यवस्था को बदलना चाहते हैं लेकिन ऊपर बैठे अफसर अभी भी पुरानी परिपाटी पर चल रहे हैं। आरटीआई जैसे कानून और सोशल मीडिया के कारण समाज में पारदर्शिता बढ़ी है। स्मार्टफोन बड़ा औजार बनकर उभरा है। फोन रिकॉर्डिग के कारण अब रिश्तवतखोरी कम हो रही है। हर कोई सोचता है सौ, दो सौ रुपये के लिए क्यों अपनी साठ सत्तर हजार की नौकरी खतरे में डाली जाए? अफसर भी अपने मातहत काम करने वालों को मौखिक और नाजायज आदेश देने से डरते हैं। पता नही कोई कब मोबाइल से रिकॉर्डिग कर ले। ड्राइवर ने एक सांस में सब कह डाला और अपनी पैंट की जेब से सिगरेट का पैकेट निकाल हाथ में थाम लिया। “क्या मैं इसे पी सकता हूं। अगर आपको एतराज ना हो तो।“ड्राइवर ने सिगरेट दिखाते हुए हमसे पूछा। पुलिस वाला होते हुए भी वो इतनी सज्जनता दिखा रहे थे तो भला हमें क्या एतराज होता ? अब वो धीमे धीमे सिगेरट के कश ले धुआं आकाश की ओर छोड़ रहे थे। अब उनके कान ही हमारी बातों की ओर थे। उनका पूरा ध्यान दूर आकाश में किसी शून्य को निहार रहा था।

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