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Showing posts from 2017

पुलिस उसकी सरकार जिसकी

“चौंतीस साल नौकरी को हो गए। सिपाही भर्ती हुआ था और आज भी सिपाही ही हूं। मेरे साथ जो भर्ती हुए थे आज वो इंस्पेक्टर बन गए लेकिन मेरे कंधे पर कोई स्टार नहीं है”। उसने अपने कंधे की ओर देखते हुए तल्खी भरी आवाज में कहा। “मेरी गलती ये है कि मैं ड्राइवर भर्ती हुआ था। यूपी में ड्राइवर को प्रमोशन नहीं है। भले ही मुझे पे स्केल इंस्पेक्टर का मिल रहा है लेकिन साहब ये तो सिर्फ मैं जानता हूं। सलाम तो वर्दी को मिलता है और वर्दी में आज भी सिपाही की ही पहनता हूं।“ बावन साल उम्र का वो खाकी वर्दीधारी आईजी मेरठ का ड्राइवर था। कान के पास कुछ बालों को छोड़ दिया जाए तो बाकी काले थे। आम पुलिसिया लोगों के विपरीत शरीर चुस्त, पेट सामान्य और आखें तेज। चश्मा अभी लगा नही था। बातचीत के लहजे से लग रहा था कि उन्होंने अपनी नौकरी से काफी कुछ सीखा है। आईजी का ये ड्राइवर अचानक हमारे साथ आकर खड़ा हो गया और हमारी बातचीत का हिस्सा बन गया था। तीन घंटे के एग्जाम में बच्चे तो अंदर सेंटर में परीक्षा दे रहे थे लेकिन हम सभी पेरेंट्स बाहर चाय की एक दुकान पर गप्पे मार रहे थे। बात कभी राजनीति की ओर लुढ़क जाती तो कभी देश के विकास पर। ...

कौन चूस रहा है खून। सरकार, मच्छर या अस्पताल?

इमरजेंसी में पहुंचते ही डॉक्टर भतीजे को आईसीयू में भर्ती करने पर तुला हुआ था। मैंने डॉक्टर से कहा कि आईसीयू की जरूरत क्या है। आप सामान्य वार्ड में भर्ती कर इलाज शुरू कीजिये लेकिन वो मानने को तैयार नहीं था। उसने मोबाइल से अपने सीनियर को फोन किया। उसने बताया कि ये टेस्ट लिख दिये हैं। क्या और कोई टेस्ट भी करवाने हैं? डॉक्टर ने उसे तीन टेस्ट और बता दिए। उसने वो भी लिख दिए। फोन रखने के बाद वो फिर आईसीयू में भर्ती करने पर अड़ गया। “मरीज की हालत बिगड़ती जा रही है। आईसीयू में भर्ती करना जरूरी है। जल्दी फैसला कीजिये“ डॉक्टर बोला। “लेकिन मरीज तो सही है और हमारे साथ चलकर इमरजेंसी तक आया है। आप भर्ती कर इलाज शुरू कीजिये” मैंने कहा । डॉक्टर कुछ माना और इस बार सेमी आईसीयू में रखने की जिद करने लगा। दसवीं में पढ़ने वाले चौदह साल के भतीजे को चार दिनो से हाई फीवर और उल्टी दस्त बने हुए थे। पास के काबिल डॉक्टर को दिखाया तो उसने दवा दे डेंगू का टेस्ट करवाने को कहा। डेंगू की रिपोर्ट नगेटिव आई और प्लेटलेट की संख्या नब्बे हजार। लेकिन चार दिनों तक जब बुखार में आराम नहीं हुआ और रात में उल्टी दस्त बढ़ गए तो हम भ...

ई वॉलेट की कहानी

एक बार देख लीजिये कि आपके ई वॉलेट में पैसे आए कि नहीं? मरीज के मुंह में झांक रहे डेंटिस्ट से मैंने कहा। डेंटिस्ट ने अपने औजार एक तरफ रखे और मोबाइल उठा कर चेक किया। सहमति में गर्दन हिलाई। पैसे उनके ई वॉलेट एकाउंट में पहुंच चुके थे। मैंने ये पैसे वहीं बैठकर अपने क्रेडिड कार्ड से ई वॉलेट से ट्रांसफर किए थे। इस प्रक्रिया में वन टाइप पासवर्ड आने और पैसे ई वॉलेट में जुड़ने में दस मिनट लग गए। इस दौरान डेंटिस्ट कई बार मुझ पर और सरकार पर झल्ला चुका था। बताओ कोई बात है? सरकार ने अच्छा भला झंझट खड़ा कर दिया। हर पेशंट ऐसा करने लगे तो चल गया हमारा काम? इतने में तो आप जेब से पैसे निकाल कर चले भी गए होते। उसने तल्खी भरे स्वर में कहा। मैंने कहा आप कार्ड स्वाइप मशीन क्यों नहीं लगवा लेते? वो उसके लिए करंट एकाउंट चाहिए होता है ना? उन्होंने जवाब दिया? क्या आपके पास करंट एकाउंट नहीं है? मैंने चौकते हुए कहा। वो मुस्कुराए और बोले अभी अप्लाई किया है। बैंकों के पास काम ज्यादा हैं ना इसलिए देरी हो रही है। एक हफ्ते में करंट एकाउंट खुल जाएगा तब उसके बाद स्वाइप मशीन लगा लेंगे। दरअसल दांत में पिछले दो हफ्ते से द...