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Showing posts from 2016

सादी शादी का सबक

जितनी बड़ी शादी उतनी बड़ी चर्चा। हमारे देश में बड़ी शादियां महीनों पहले ही मीडिया की सुर्खियां बनने लगती हैं। टीवी चैनल बारीक से बारीक से जानकारी परोसने लगते हैं। मेहमान कैसे आएंगे ? कहां ठहरेंगे ? भोजन में क्या क्या परोसा जाएगा वगैरहा वगैरहा । पर क्या ये सही है? शायद ही किसी भव्य शादी और उसमें बेहिसाब खर्च की आलोचना की जाती हो। वो भी उस देश में जहां आज भी तीस करोड़ लोग रात को भूखे पेट सोते हों ? बात सही है कि देश में आज भी सत्तर फीसदी परिवार रोजाना डेढ़ सौ रुपये से भी कम में अपना गुजर बसर करते हैं। फिर क्यों भड़कीली शादियों में हजारों करोड़ रुपये खर्च नहीं बहाए जाते हैं? बड़ी शादियों की तो छोड़िये हमारे यहां मध्यम वर्गीय विवाह समारोह में भी छप्पन तरह की डिश परोसी जाती हैं। इन आयोजनों में कई डिश ऐसी होती है जिन्हें कोई छूता भी नहीं। ये डिश या सब्जी खाने की टेबल पर लगा तो दी जाती है लेकिन किसी के ना छुने के कारण उन पर मोटी परत बन जाती है। आप कितने ही भूखे क्यों ना हो ज्यादा से ज्यादा कितनी डिश टेस्ट कर सकते हैं। दो, चार, छह, आठ या फिर दस, बस। कोई कितना खा सकता है? सौ ग्राम दो सौ ग...

सरकारी दफ्तर में खर्चा पानी

रजिस्ट्री के कागज और फॉर्म लेते ही मैडम ने एक नजर मेरी ओर डाली और सामने रखे कैलकुलेटर पर हिसाब करने लगी। दो सैकेंड रूकी और फिर खुद पर झल्ला कर दुबारा कैलकुलेटर पर जोड़ घटा करने लगी। बारह हजार पांच सौ उसने कहा। मैंने तुरंत रकम पकड़ा दी। उसने गिने और साथ रखी तिजोरी में रख लिए। उसने मेरे कागजों की इंट्री वहां रखे मोटे से रजिस्टर में की और मुहर लगा कर मुझे पकड़ा दिए। अगली खिड़की पर पहुंचा तो उस स्लीप पर नजर दौड़ाई जो मैडम ने मुझे पकड़ाई थी। उसमें रकम ग्यारह हजार नौ सौ पैंतीस लिखी थी। फिर उसने बारह हजार पांच सौ क्यों लिये? मैं उलटे पैर मोहतरमा के पास लौटा। “मैडम इसमें तो इतनी रकम लिखी है आपने ज्यादा क्यों लिए” मैंने कहा। “पांच सौ रुपये ऑफिस का खर्चा होता है। सभी से लेते हैं” उसने बेहिचक जवाब दिया। “लेकिन ऑफिस तो सरकारी है फिर खर्चा कैसा? आप पैसे रख लीजिये बस मुझे पर्ची दे दीजिये” मैंने कहा। इस बार उसने हैरत से मुझे देखा। उसने नहीं वहां मौजूद बाकी लोग भी मुझे उसी नजर से देख रहे थे जैसे मैं पहली बार रजिस्ट्रार दफ्तर आया हूं। हकीकत भी ये थी कि मैं पहली बार आया था। कभी वहां जाने का वास्ता ही नह...

स्कूल वाउचर से आएगा शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव

हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजधानी ढ़ाका से 70 किलोमीटर दूर एक गांव में रहने वाली फातिमा आम बच्चों की तरह ही है। कक्षा 10 में पढ़ने वाली फातिमा एक कपड़ा मजदूर की बेटी है। उसके वालिद की इतनी हैसियत नहीं कि उसकी पढ़ाई का खर्चा उठा सके। बावजूद इसके फातिमा पिछले दस सालों से हर रोज मुस्कुराते हुए स्कूल जाती है। उसकी पढ़ाई वहां की सरकार की वाउचर प्रणाली के कारण मजे से चल रही है। उसे हर महीने 36 डॉलर यानी 2800 टका वहां की करेंसी में मिलते हैं। उसकी पढ़ाई पर जो खर्च आता है उसे बांग्लादेश सरकार सीधे उसके बैंक खाते में डाल देती है। 1993 में शुरू हुए बांग्लादेश फीमेल सैकेंडरी स्कूल असिस्टैंस प्रोजेक्ट के तहत लड़कियों को सीधे वाउचर प्रणाली से पैसा दिया जा रहा है। इसके तहत बांग्लादेश के 118 जिलों में कक्षा 6 में दाखिला लेने वाली छात्राओं को 12 डॉलर यानी करीब 936 टका से कक्षा 10 तक 2800 टका दिए जा रहे हैं। इस प्रोजेक्ट से वहां की शिक्षा व्यवस्था पर जबरदस्त सकारात्मक असर पड़ा है। इससे वहां स्कूलों का खर्च तो घटा ही है, साथ ही बांग्लादेश जैसे विकासशील मुल्क में महिला साक्षरता दर भी बढ़ी है। गर...

किस्मत का मारा किसान

छाछ बिल्कुल गाढ़ी थी। कोई चार एक घंटे पहले बनाई होगी। उस पर जीरे का छौंक और हल्की सी हींग के कारण जायका बन गया था। पीतल के जिन बड़े गिलासों में छाछ हमें सर्व की गई थी वो भी आम शहरी गिलासों के मुकाबले दोगुने थे। सुबह के हल्के कुहासे के बीच खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की कुर्सियों पर अनजाने लोगों के बीच छाछ पीना नया अनुभव था। छाछ का हर घूंट हमें अमृत सरीखा लग रहा था। आप समय से आ गए, नहीं तो अब तक हम इसे भैंसो को पिला चुके होते, हमारे सामने खाट पर बैठे सज्जन ने कहा। गांव में इसे कोई नहीं पीता, मक्खन निकालने के बाद इसे चारे के साथ भैसों को दे देते हैं। लेकिन शहर में ऐसी ताजी छाछ कहां मिलती है। दूध थैलियों में आता है। मन हुआ तो दही जमा ली लेकिन छाछ कहीं नहीं मिलती, मैंने कहा। दिल्ली से जयपुर जाते हुए हम अचानक ही इस गांव में आ पहुंचे थे। दोस्त का पीएचडी का इम्तिहान था। हम तीन साथी अल सुबह अपनी कार से निकले थे। नीमराणा से आगे बढ़ते ही दोस्त ने कहा कहीं अच्छी चाय पी जाए। चाय तो रोज पीते हैं आज छाछ पीते हैं, मैंने कहा। पर छाछ मिलेगी कहां ? छाछ की तलाश में ही हाइवे से दो किलोमीटर दूर हम रजियाव...

देसी शादी, विदेशी मेहमान

बारात पूरे शवाब पर थी। बाजे वाले पूरी ताकत से बजा रहे थे तो बाराती उससे ज्यादा जोर लगाकर नाच रहे थे। कहीं नागिन डांस चल रहा था तो कोई ढोल की थाप पर झूम रहा था। इन सबके बीच दूल्हे मियां बग्गी पर बैठे मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। ऐसा पूरे एक घंटे से चल रहा था और बारात चंद कदम ही बढ़ पाई थी। नोएडा के जिस सेक्टर में ये बारात आई थी वो चारों ओर गांव से घिरा है। जहां ये सेक्टर बना वहां कभी इस गांव के खेत हुआ करते थे। कहने को ये गांव है पर यहां जरूरत की हर वो चीज मौजूद है जो शहर में होती है। इसी गांव की पोस्ट ग्रेजुएट लड़की से हमारे घनिष्ठ साथी की शादी हो रही थी। इस शादी के लिए हमारे सर्कल में आए एक नए मित्र को भी सपरिवार निमंत्रण मिला। वो अपनी स्पैनिश पत्नी और दो बच्चों के साथ शादी में शामिल होने को तैयार थे लेकिन उनकी एक दिक्कत थी। उनकी पत्नी की एक महिला मित्र भी स्पेन से आकर उनके घर ठहरी हुई थी। दोस्त अपने परिवार के साथ शादी में जाना चाहते थे पर परेशान थे कि इस दौरान अपनी पत्नी की मित्र को कहां ठहराएं। उन्होंने अपनी ये प्रॉब्लम साझा की तो हमने सलाह दी उसे भी विवाह समारोह में ले चलो। बारातियों क...

यूपी की राजधानी दिल्ली

सर अपने घर इटावा जाना है। चार दिनों की छुट्टी चाहिए? उस लड़की ने मेरे करीब आकर कहा। इटावा कहां है मैंने पूछा? उसने कहा यूपी में। मैंने फिर पूछा यूपी की राजधानी क्या है? उसने कहा दिल्ली। इस बार मैं चौका और कुर्सी पर बैठे बैठे ही उसकी ओर मुखातिब हो बोला, जरा फिर से बोलना। उसे लगा कुछ गड़बड़ है। इस बार उसने कहा कानपुर। मैं तमतमा उठा। मैंने कहा किसने कहा तुमसे पत्रकारिता करने को। जब तुम्हें यही नहीं पता कि यूपी की राजधानी क्या है तो तुम करोगी क्या? वो घबरा गई और बोली सर वो मैं भूल गई। पता करके बता दूंगीं। ये लड़की किसी संस्थान से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दो महीने की ट्रेनिंग के लिए आ रही थी। ऐसे बच्चे सालभर आते जाते रहते हैं। उनका सामान्य ज्ञान परखने के लिए अक्सर मैं उनसे इस तरह के सवाल करता रहता हूं। ज्यादातर निराश करते हैं। टेलीविजन चकाचौंध वाला प्रोफेशन है इसलिए अधिकतर इसमें करियर बनाना चाहते हैं। इसी लड़की के साथ उसकी एक हमउम्र और है। उसके पिता नहीं है। मां सब्जी का ठेला लगाती है। किसी तरह बेटी को प्राइवेट विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का कोर्स कराया। दो लाख रुपये खर्च कर दिए लेक...

बोर्ड इम्तिहान का खौफ

गर्मी बिल्कुल नहीं थी बावजूद इसके उसके माथे से पसीना बह रहा था। सांसे तेज चल रही थी। हाथों में थामी कुछ मोटी किताबें को सीने से लगाए वो मम्मी पापा की बातें सुन रही थी। एग्जाम शुरू होने में अभी एक घंटे से ज्यादा बाकी था। इन तीनों के साथ चौथे सज्जन भी वहां थे जो शायद उसके ट्यूटर थे। वो भी बीच बीच में लड़की को टिप्स दे रहे थे। लड़की कभी ट्यूटर की ओर देखकर सिर हिलाती तो कभी मम्मी पापा की ओर देख गर्दन हिलाने लगती। कुछ ध्यान में आता तो उन किताबों के पन्ने पलटने लगती जो उसने थामी हुई थी। सीबीएसई का आज बारहवीं कक्षा का पहला बोर्ड एग्जाम था। पहला दिन था तो ज्यादातर बच्चे वक्त से पहले पहुंच गए। ज्यादातर के चेहरों पर अजीब का खौफ पसरा था। जिंदगी के पहले कड़े एग्जाम के लिए तैयारी तो सभी ने की होगी लेकिन बोर्ड के नाम से डरे डरे से थे। लड़कियां अपने ग्रुप में तो लड़के अपने गुट में चर्चा में मशगूल थे। चूंकि बोर्ड का एग्जाम है इसलिए सेंटर दूसरे स्कूल में है। बच्चों को सेंटर तक छोड़ने के लिए कुछ माता पिता साथ आए हैं तो कुछ लड़के लड़कियां खुद अपनी स्कूटी और बाइक से पहुंचे हैं। कुछ बच्चों के माता पिता ...

उनका यूं चले जाना।

वो अचानक चल बसी थी। भली चंगी थी । खूब एक्टिव भी लेकिन अचानक सांस लेने में दिक्कत होने लगी। एक हफ्ते में ही बीमारी इतनी बढ़ गई कि सांस टूटने लगा। उनके जाने की उम्मीद नहीं थी। पिता के दोस्त की पत्नी थी तो मां के साथ भी उनका अच्छा उठना बैठना था। हम प्यार से आंटी कहकर पुकारते थे। जब भी नमस्ते करते तो प्यार से पूरे परिवार का हाल चाल जाने बिना आगे नहीं बढ़ने देती थी। हमारे हर फंक्शन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती। हमारा शायद ही कोई रिश्तेदार हो जो उन्हें ना जानता हो। दफ्तर में था जब भाई का फोन आया की आंटी नहीं रही। । लेकिन उनका यूं अचानक जाना मेरे लिए सदमे जैसा था। सभी काम छोड़ उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए तुरंत दफ्तर से निकल पड़ा। उनके पार्थिव शऱीर को लेकर घर से जब निकले तो एक सज्जन सब इंस्पेक्टर की वर्दी में थे। दिल्ली में यूपी पुलिस की वर्दी देखने की आदत नहीं तो थोड़ा ताज्जुब हुआ। वो भी इस मौके पर। सोचा हो सकता है मौके की नजाकत पर तुरंत भागे आए हों या फिर और कोई वजह रही हो लेकिन उनकी पूरी कोशिश थी कि उन्हें पूरा एटेंशन मिले। अपनी इस कोशिश में वो सफल भी हो रहे थे। श्मशान भूमि में पह...

डिजिटल इंडिया की सच्चाई

दोस्त झुंझलाता सा दफ्तर में दाखिल हुआ और फट पड़ा । “क्या यार ये बैंक है या आफत। पिछले तीन घंटे में तीसरी बार एसबीआई का चक्कर लगा चुका हूं लेकिन बैंक का सर्वर तब से ही डाउन है। अगर आज एकाउंट में पैसे नहीं जमा कराए तो होम लोन का ईसीएस जंप कर जाएगा और मुझे पैनल्टी भरनी पड़ेगी। प्राइवेट बैंक का लोन है एक किस्त ना जमा करने पर सैकड़ों फोन आएँगें सो अलग।“ मैंने उसे शांत कर कुर्सी ऑफर की और कंधे पर हाथ रख कहा कि थोड़ा बैठ जाओ। देखते हैं कि दिक्कत का उपाय क्या है। दोस्त की दिक्कत वाजिब थी। उसे उस दिन एक जरूरी स्टोरी फाइल करनी थी। छुट्टी ले नहीं सकता था सो दफ्तर आते ही उसने सोचा कि क्यों ना पहले बैंक का काम निपटा लिया जाए। कुछ देर में आने की कह वो बैंक खुलते ही दफ्तर से निकल गया। बैंक पहुंचते ही देखा कि वहां तो लोगों का सैलाब जमा है। सर्वर डाउन है इसलिए बैंककर्मी मस्त हैं और लाइन में लगे ग्राहक पस्त । कोई काम नहीं हो रहा। दोस्त लौट आया । कुछ देर काम करने के बाद वो इस उम्मीद में बैंक लौटा कि शायद सर्वर ठीक हो गया होगा लेकिन इस बार हालत पहले से बदतर थे। बैंक लोगों से खचाखच भरा हुआ था और पैर रखने...