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Showing posts from April, 2015

तेईस का तिलिस्म

तेईस पर मात्रा छोटी इ की आएगी। ये कहना था चौथी क्लास में बेटे को पढ़ाने वाली मैडम का। साठ नंबर के एग्जाम में मैडम आधा नंबर इसका काट चुकी थी। बेटे ने आंसर शीट पर तेईस को सही तरीके से तेईस ही लिखा था लेकिन मैडम ने उसके आगे क्रॉस लगाकर आधा नंबर काट लिया था। पैरेंट्स मीटिंग में मैडम ने बेटे की सभी विषयों की आंसर शीट दिखाई। बाकी सभी तो ठीक थी लेकिन हिन्दी की आंसर शीट पर तेईस को सही लिखने के बावजूद भी आधा नंबर काटा हुआ था। हर महीने के दूसरे शनिवार को होने वाली पैरेंट्स मीटिंग में अमूमन पत्नी जाती हैं। अपुन इस समय दफ्तर में होते हैं इसलिए ये ड्यूटी पत्नी की ही लगती है। लेकिन इस बार छुट्टी ले स्कूल पहुंच गए। मैडम की दलील थी कि तेईस पर मात्रा छोटी इ की ही आएगी क्योंकि सही शब्द तेइस है। अपनी गलती और अधूरे ज्ञान को सही साबित करने की कोशिश में वो इंग्लिश में गिटपिट करने लग जाती थी। हिन्दी की मात्रा पर इंग्लिश में बहस करना बिलकुल अटपटा लग रहा था लेकिन मैडम अपनी बात पर अड़ी थी। बाकी पैरेंट्स के सामने शायद उसे अपने अल्पज्ञान को स्वीकार करना मुश्किल पड़ रहा था। ये दूसरा वाक्या था जब इस मोहतरमा से मेरा...

किस्मत का मारा किसान

छाछ बिल्कुल गाढ़ी थी। कोई चार एक घंटे पहले बनाई होगी। उस पर जीरे का छौंक और हल्की सी हींग के कारण जायका बन गया था। पीतल के जिन बड़े गिलासों में छाछ हमें सर्व की गई थी वो भी आम शहरी गिलासों के मुकाबले दोगुने थे। सुबह के हल्के कुहासे के बीच खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की कुर्सियों पर अनजाने लोगों के बीच छाछ पीना नया अनुभव था। छाछ का हर घूंट हमें अमृत सरीखा लग रहा था। आप समय से आ गए, नहीं तो अब तक हम इसे भैंसो को पिला चुके होते, हमारे सामने खाट पर बैठे सज्जन ने कहा। गांव में इसे कोई नहीं पीता, मक्खन निकालने के बाद इसे चारे के साथ भैसों को दे देते हैं। लेकिन शहर में ऐसी ताजी छाछ कहां मिलती है। दूध थैलियों में आता है। मन हुआ तो दही जमा ली लेकिन छाछ कहीं नहीं मिलती, मैंने कहा। दिल्ली से जयपुर जाते हुए हम अचानक ही इस गांव में आ पहुंचे थे। दोस्त का पीएचडी का इम्तिहान था। हम तीन साथी अल सुबह अपनी कार से निकले थे। नीमराणा से आगे बढ़ते ही दोस्त ने कहा कहीं अच्छी चाय पी जाए। चाय तो रोज पीते हैं आज छाछ पीते हैं, मैंने कहा। पर छाछ मिलेगी कहां ? छाछ की तलाश में ही हाइवे से दो किलोमीटर दूर हम रजियाव...

गड्डों में देश

हिन्दुस्तान को गड्डों से काफी प्यार है। सुबह चिकनी सड़क बनती है, अगली सुबह वहां एक चौड़ा गड्डा बन चुका होता है। कुछ बुद्धिजीवियों का मानना है कि कभी एलियन मिले तो वो पाताल में इन्हीं गड्डों के जरिये मिलेंगे। हिन्दुस्तान के जर्रे जर्रे में रोजाना इतने गड़डे खुदते हैं कि कहीं भी किसी भी गड्डे से एलियन निकल सकते हैं। नासा नाहक ही अरबों डॉलर खर्च कर अंतरिक्ष में एलियन की खाक छान रहा है । उसे भारतीय गड्डों पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। रोचक ये है कि गड्डे चांद पर भी हैं और गोल्फ के मैदान में भी। चांद के गड्डे धरती से दिखते हैं, धरती के गड्डे चांद से। नील आर्मस्ट्रांग ने चांद पर कदम रखते ही भारतीय गड्डों की खूबसूरती का खूब आनंद लिया था। कुछ गड्डे दीर्घायु होते है तो कुछ पैदा होते ही भर दिए जाते हैं। जो पैदा होते ही भर दिए जाते हैं देर सवेर उनकी किस्मत में फिर खुदना लिखा होता है। गड्डे कई प्रकार होते हैं। ठेकेदार के जरिये कमीशन खाने के लिए बनाए गए गड्डे। फालतू बजट को निपटाने के लिए जबरदस्ती बनाए गए गड्डे, बाऱिश के दौरान सड़क धंसने से बनने वाले गड्डे और दूसरो के लिए खोदे गए गड्डे। जिस तरह का ...