खान साहब का गुड़
चालीस रुपये किलो है। “भाई साहब वो पंजाब, हरियाणा का गुड़ है और ये यूपी का। यूपी का गुड़ अच्छा होता है क्योंकि वहां का गन्ना अलग मिट्टी में होता है, उसने एक सांस में दलील दी। पर गुड़ तो गुड़ है इससे क्या फर्क पड़ता है, मैंने कहा। क्यों नहीं फर्क पड़ता भाई साहब, एक सेब शिमला का होता है और एक कश्मीर का दोनों के दाम में अंतर होता है कि नहीं? उसने चेहरे पर स्माइल लाते हुए एक बार फिर दलील दी। ये बातचीत गुड़ बेचने वाले से हो रही थी। अमूमन दिल्ली और एनसीआर के ज्यादातर इलाकों में गुड़ के सीजन में ट्रैक्टर के साथ ट्रॉली पर कुछ लोग गुड़ बेचने आते हैं। ये सज्जन भी उन्हीं में एक थे। आते जाते इन सज्जन पर नजर पड़ती तो ये गुड़ से भरी ट्रैक्टर ट्रॉली के एक किनारे पर रजाई में पैर दबाए नजर आते। “खुले आसमान के नीचे महज एक पतली रजाई से सर्दी से बच जाते हो?” मैने सवाल किया। भाई साहब हम किसान आदमी है, आदत है। भरी सर्दी में जब लोग रजाई में सोते हैं हम पानी के बीच खडे होकर खेतों में पानी देते हैं। मैं 18 सालों से हर साल यहीं ट्रॉली लगाकर गुड़ बेचता हूं। होली तक ऐसे ही चलता है। एक ट्रैक्टर ट्रॉली को खत्म होन...