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स्कूल में बाउंसर

पहले मैं चौका। फिर मुझ देखकर बेटा। स्कूल के गेट पर बाउंसर खड़ा था। करीब छह फीट लंबा। हट्टे कट्टे बदन का मालिक। मटमैले कलर का सफारी सूट पहने वो स्कूल आने वाले बच्चों को गेट के अंदर कर रहा था। गेट के एक तरह हमेशा की तरह वर्दीधारी गार्ड था पर गेट के दूसरी तरह खड़ा ये बाउंसर पहली बार दिख रहा था। आमतौर पर बेटे को स्कूल छोड़ने की ड्यूटी पत्नी की होती है पर उस दिन अचानक मुझे जाना पड़ा। मुझे ताज्जुब में देख बेटा बोला। “डैडी इनको तो पन्द्रह दिन हो गए यहां आए हुए। ऐसे अंदर दो और हैं। एक अंदर वाले गेट पर खड़ा रहता है और एक सभी फ्लोर पर घूमता रहता है। ये आंख पर एक घूंसा मार दे तो दिखना बंद हो जाता है।“ मैने पूछा आपको कैसे पता। बोला मैंने टीवी पर फिल्मों में देखा है। खैर बेटे को हमेशा की तरह हैव ए गुड डे बोल गेट के अंदर कर मैं घर लौट आया। सोचा आज स्कूल की छुट्टी होने पर प्रिसिंपल से मिला जाए। स्कूल में प्रिंसिपल से मिलने का समय बच्चों की छुट्टी के बाद फिक्स है। इस सूचना की जानकारी देने के लिए स्कूल के बाहर बाकायदा बोर्ड भी लगा है। स्कूल की छुट्टी होने पर बेटा बाहर आया तो वॉटर बोटल क्लास में ही...