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सादी शादी का सबक

जितनी बड़ी शादी उतनी बड़ी चर्चा। हमारे देश में बड़ी शादियां महीनों पहले ही मीडिया की सुर्खियां बनने लगती हैं। टीवी चैनल बारीक से बारीक से जानकारी परोसने लगते हैं। मेहमान कैसे आएंगे ? कहां ठहरेंगे ? भोजन में क्या क्या परोसा जाएगा वगैरहा वगैरहा । पर क्या ये सही है? शायद ही किसी भव्य शादी और उसमें बेहिसाब खर्च की आलोचना की जाती हो। वो भी उस देश में जहां आज भी तीस करोड़ लोग रात को भूखे पेट सोते हों ? बात सही है कि देश में आज भी सत्तर फीसदी परिवार रोजाना डेढ़ सौ रुपये से भी कम में अपना गुजर बसर करते हैं। फिर क्यों भड़कीली शादियों में हजारों करोड़ रुपये खर्च नहीं बहाए जाते हैं? बड़ी शादियों की तो छोड़िये हमारे यहां मध्यम वर्गीय विवाह समारोह में भी छप्पन तरह की डिश परोसी जाती हैं। इन आयोजनों में कई डिश ऐसी होती है जिन्हें कोई छूता भी नहीं। ये डिश या सब्जी खाने की टेबल पर लगा तो दी जाती है लेकिन किसी के ना छुने के कारण उन पर मोटी परत बन जाती है। आप कितने ही भूखे क्यों ना हो ज्यादा से ज्यादा कितनी डिश टेस्ट कर सकते हैं। दो, चार, छह, आठ या फिर दस, बस। कोई कितना खा सकता है? सौ ग्राम दो सौ ग...