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सरकारी दफ्तर में खर्चा पानी

रजिस्ट्री के कागज और फॉर्म लेते ही मैडम ने एक नजर मेरी ओर डाली और सामने रखे कैलकुलेटर पर हिसाब करने लगी। दो सैकेंड रूकी और फिर खुद पर झल्ला कर दुबारा कैलकुलेटर पर जोड़ घटा करने लगी। बारह हजार पांच सौ उसने कहा। मैंने तुरंत रकम पकड़ा दी। उसने गिने और साथ रखी तिजोरी में रख लिए। उसने मेरे कागजों की इंट्री वहां रखे मोटे से रजिस्टर में की और मुहर लगा कर मुझे पकड़ा दिए। अगली खिड़की पर पहुंचा तो उस स्लीप पर नजर दौड़ाई जो मैडम ने मुझे पकड़ाई थी। उसमें रकम ग्यारह हजार नौ सौ पैंतीस लिखी थी। फिर उसने बारह हजार पांच सौ क्यों लिये? मैं उलटे पैर मोहतरमा के पास लौटा। “मैडम इसमें तो इतनी रकम लिखी है आपने ज्यादा क्यों लिए” मैंने कहा। “पांच सौ रुपये ऑफिस का खर्चा होता है। सभी से लेते हैं” उसने बेहिचक जवाब दिया। “लेकिन ऑफिस तो सरकारी है फिर खर्चा कैसा? आप पैसे रख लीजिये बस मुझे पर्ची दे दीजिये” मैंने कहा। इस बार उसने हैरत से मुझे देखा। उसने नहीं वहां मौजूद बाकी लोग भी मुझे उसी नजर से देख रहे थे जैसे मैं पहली बार रजिस्ट्रार दफ्तर आया हूं। हकीकत भी ये थी कि मैं पहली बार आया था। कभी वहां जाने का वास्ता ही नह...