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उनका यूं चले जाना।

वो अचानक चल बसी थी। भली चंगी थी । खूब एक्टिव भी लेकिन अचानक सांस लेने में दिक्कत होने लगी। एक हफ्ते में ही बीमारी इतनी बढ़ गई कि सांस टूटने लगा। उनके जाने की उम्मीद नहीं थी। पिता के दोस्त की पत्नी थी तो मां के साथ भी उनका अच्छा उठना बैठना था। हम प्यार से आंटी कहकर पुकारते थे। जब भी नमस्ते करते तो प्यार से पूरे परिवार का हाल चाल जाने बिना आगे नहीं बढ़ने देती थी। हमारे हर फंक्शन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेती। हमारा शायद ही कोई रिश्तेदार हो जो उन्हें ना जानता हो। दफ्तर में था जब भाई का फोन आया की आंटी नहीं रही। । लेकिन उनका यूं अचानक जाना मेरे लिए सदमे जैसा था। सभी काम छोड़ उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होने के लिए तुरंत दफ्तर से निकल पड़ा। उनके पार्थिव शऱीर को लेकर घर से जब निकले तो एक सज्जन सब इंस्पेक्टर की वर्दी में थे। दिल्ली में यूपी पुलिस की वर्दी देखने की आदत नहीं तो थोड़ा ताज्जुब हुआ। वो भी इस मौके पर। सोचा हो सकता है मौके की नजाकत पर तुरंत भागे आए हों या फिर और कोई वजह रही हो लेकिन उनकी पूरी कोशिश थी कि उन्हें पूरा एटेंशन मिले। अपनी इस कोशिश में वो सफल भी हो रहे थे। श्मशान भूमि में पह...