नहीं बदले सरकारी बैंक
क्लर्क चारों ओर भीड़ से घिरा था। हर कोई जनधन योजना का फॉर्म जमा कराने की जल्दी में था। क्लर्क भी लोगों के फॉर्म जमा कम उनसे उलझ ज्यादा रहा था। क्लर्क की तरह उसी लाइन में दो बाबू और बैठे थे वो भी उसी की तरह लोगों की बेहिसाब भीड़ से जूझ रहे थे। उन तीनों के सामने कम्प्यूटर थे लेकिन बंद। कम्प्यूटरों की बजाय ये पैन से काम कर भीड़ पर पार पाने की कोशिश कर रहे थे। अपना काम इन तीनों में से कोई एक कर सकता था लेकिन भीड़ के आगे उन तक पहुंचना टेढ़ी खीर था। एकाउंट में बैलेंस होने के बावजूद जब एटीएम ने कई कोशिश के बाद भी पैसे नहीं उगले तो दिक्कत जानने के लिए सुल्तानपुर माजरा में बैंक ऑफ बडौदा ब्रांच में जाने का फैसला किया। पता नहीं सरकारी बैंक में जाने के नाम से ही अपनी रूह कांपने लगती है। इस ब्रांच में मिले तमाम कड़वे अनुभवों के आधार पर सबसे पुराने अपने एकाउंट को बंद करवाने का विचार भी कई बार आया लेकिन ये सोच कर टाल दिया कि एक सरकारी बैंक में खाता होना ही चाहिए। आज अपना वीकली ऑफ था। सोचा अगर आज काम नहीं हुआ तो कल छुट्टी लेनी पड़ेगी और फिर क्या गारंटी की कल भी काम हो या नहीं ? ...