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नहीं बदले सरकारी बैंक

क्लर्क चारों ओर भीड़ से घिरा था। हर कोई जनधन योजना का फॉर्म जमा कराने की जल्दी में था। क्लर्क भी लोगों के फॉर्म जमा कम उनसे उलझ ज्यादा रहा था। क्लर्क की तरह उसी लाइन में दो बाबू और बैठे थे वो भी उसी की तरह लोगों की बेहिसाब भीड़ से जूझ रहे थे। उन तीनों के सामने कम्प्यूटर थे लेकिन बंद। कम्प्यूटरों की बजाय ये पैन से काम कर भीड़ पर पार पाने की कोशिश कर रहे थे। अपना काम इन तीनों में से कोई एक कर सकता था लेकिन भीड़ के आगे उन तक पहुंचना टेढ़ी खीर था। एकाउंट में बैलेंस होने के बावजूद जब एटीएम ने कई कोशिश के बाद भी पैसे नहीं उगले तो दिक्कत जानने के लिए सुल्तानपुर माजरा में बैंक ऑफ बडौदा ब्रांच में जाने का फैसला किया। पता नहीं सरकारी बैंक में जाने के नाम से ही अपनी रूह कांपने लगती है। इस ब्रांच में मिले तमाम कड़वे अनुभवों के आधार पर  सबसे पुराने अपने एकाउंट को बंद करवाने का विचार भी कई बार आया लेकिन ये सोच कर टाल दिया कि एक सरकारी बैंक में खाता होना ही चाहिए। आज अपना वीकली ऑफ था। सोचा अगर आज काम नहीं हुआ तो कल छुट्टी लेनी पड़ेगी और फिर  क्या गारंटी की कल भी काम हो या नहीं ? ...

तेईस का तिलिस्म !

    तेईस पर मात्रा छोटी इ की आएगी। ये कहना था चौथी क्लास में बेटे को पढ़ाने वाली मैडम का। साठ नंबर के एग्जाम में मैडम आधा नंबर इसका काट चुकी थी। बेटे ने आंसर शीट पर तेईस को सही तरीके से तेईस ही लिखा था लेकिन मैडम ने उसके आगे क्रॉस लगाकर आधा नंबर काट लिया था। पैरेंट्स मीटिंग में मैडम ने बेटे की सभी विषयों की आंसर शीट दिखाई। बाकी सभी तो ठीक थी लेकिन हिन्दी की आंसर शीट पर तेईस को सही लिखने के बावजूद भी आधा नंबर काटा हुआ था। हर महीने के दूसरे शनिवार को होने वाली पैरेंट्स मीटिंग में अमूमन पत्नी जाती हैं। अपुन इस समय दफ्तर में होते हैं इसलिए ये ड्यूटी पत्नी की ही लगती है। लेकिन इस बार छुट्टी ले स्कूल पहुंच गए। मैडम की दलील थी कि तेईस पर मात्रा छोटी इ की ही आएगी क्योंकि सही शब्द तेइस है। अपनी गलती और अधूरे ज्ञान को सही साबित करने की कोशिश में वो इंग्लिश में गिटपिट करने लग जाती थी। हिन्दी की मात्रा पर इंग्लिश में बहस करना बिलकुल अटपटा लग रहा था लेकिन मैडम अपनी बात पर अड़ी थी। बाकी पैरेंट्स के सामने शायद उसे अपने अल्पज्ञान को स्वीकार करना मुश्किल पड़ रहा था। ये दूसरा वाक्या थ...

मेट्रो के वो पांच मुसाफिर

     गिनती में वो पांच थे। दो लड़कियां और तीन लड़के। उम्र पन्द्रह सोलह साल। स्कूल ड्रेस में बैग संभाले पांचों बहुत ही बातूनी। मेट्रो के तीसरे कोच में लड़कियां रिजर्व लेडीज सीट पर बैठी थीं जबकि लड़के खड़े थे। ये पांचों झुंड बनाकर बातों में बिजी थे। बात किस मुद्दे पर चल रही थी आसपास खड़े बाकी लोगों की तरह मेरी भी समझ से परे थी लेकिन उनकी भाव भंगिमा के कारण पूरे कोच की नजरें उन पर थी। बोलने और सुनने की क्षमता से मोहताज ये पांचों साइन लैंग्वेज के जरिये बातें कर रहे थे। ये पांचों डेफ एंड डंब यानि गूंगे और बहरे स्कूल के स्टूडेंट थे । सभी इतनी तेजी से अपनी उंगलियों को हथेली के सहारे चला रहे थे कि पता ही नहीं लगता था कि क्या कहना चाह रहे हैं लेकिन इतना साफ था कि ये सभी एक दूसरे की बातें बखूबी समझ रहे हैं। आसपास खड़े लोगों को उनकी बातें भले समझ ना आ रही हों लेकिन रस सभी ले रहे थे। ये पांचों बाकी दुनिया से बेखबर आपस में मस्त थे। सभी के चेहरे पर गजब का आत्म विश्वास झलक रहा था। कहीं से नहीं लगता था कि उन्हें इस बात का मलाल है कि कुदरत ने बोलने और सुनने की शक्ति नहीं दी। उनकी ...